विदेशों में काम कर रहे माता-पिता, 90 हजार बच्चे पीअर का इंतजार करते हुए; बुजुर्ग कंधों पर बढ़ता पालन-पोषण का बोझ
लुधियाना से रिपोर्ट:
पंजाब के गांवों में बड़े-बड़े घरों की रोशनी के पीछे एक गहरी खामोशी भी बसती जा रही है। यहां हजारों बच्चे ऐसे हैं जिनके माता-पिता विदेशों में काम कर रहे हैं, और वे अपने दादा-दादी या अन्य परिजनों के साथ रहकर बड़े हो रहे हैं। मां-बाप से उनका रिश्ता अब मोबाइल स्क्रीन तक सिमट गया है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में करीब 90 हजार बच्चे ऐसे हैं जो पीअर (Parents Abroad Effected) की स्थिति में हैं। ये बच्चे दिनभर घर में रहते हैं, लेकिन उनके जीवन में भावनात्मक खालीपन साफ नजर आता है। मां से बात अब सिर्फ वीडियो कॉल पर होती है, जहां मुस्कान तो दिखती है, मगर स्पर्श और अपनापन गायब रहता है।
बचपन की खामोशी और जिम्मेदारियों का बोझ
ऐसे बच्चों की देखभाल का जिम्मा अधिकतर बुजुर्गों पर है, जो उम्र और स्वास्थ्य की सीमाओं के बावजूद बच्चों की परवरिश कर रहे हैं। स्कूल छोड़ने-लाने से लेकर खाने-पीने और दिनचर्या संभालने तक, हर जिम्मेदारी उनके कंधों पर है।
कई मामलों में देखा गया है कि बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर हो रहे हैं। वे चुपचाप रहते हैं, जल्दी गुस्सा हो जाते हैं या फिर अकेलेपन में खो जाते हैं। कुछ बच्चे बार-बार फोन पर माता-पिता को बुलाने की जिद करते हैं, जबकि कुछ धीरे-धीरे अपनी भावनाएं दबाने लगते हैं।
पांच केस स्टडी में झलकती सच्चाई
- एक बच्चा रोते हुए फोन पर मां को बुलाता है, लेकिन जवाब में सिर्फ “जल्दी आएंगे” मिलता है।
- एक अन्य बच्चा अपने दादा-दादी को ही “मम्मी-पापा” कहने लगता है।
- स्कूल में ध्यान न लगना और चुप रहना भी आम समस्या बन रही है।
- बुजुर्गों पर जिम्मेदारी का दबाव उनके स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है।
- कई परिवारों में आर्थिक मजबूरी बच्चों की भावनात्मक जरूरतों पर भारी पड़ रही है।
विशेषज्ञों की राय
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, माता-पिता की अनुपस्थिति बच्चों के भावनात्मक और मानसिक विकास पर गहरा असर डालती है। ऐसे बच्चे असुरक्षा, गुस्से और अकेलेपन की भावना से जूझते हैं। सही मार्गदर्शन और समय पर भावनात्मक सहयोग न मिले तो उनका व्यक्तित्व भी प्रभावित हो सकता है।
निष्कर्ष:
बेहतर भविष्य और कमाई की तलाश में विदेश जाना एक बड़ा फैसला है, लेकिन इसकी कीमत कई बार बच्चों के बचपन से चुकानी पड़ती है। वीडियो कॉल इस दूरी को पूरी तरह नहीं भर सकती। जरूरत है कि समाज और सरकार मिलकर ऐसे बच्चों के लिए बेहतर सपोर्ट सिस्टम तैयार करें, ताकि उनका बचपन खामोश न रहे।


