पांचाल की ऐतिहासिक धरती से लेकर देश-प्रदेश की सियासत तक बरेली ने निभाई अहम भूमिका, पंत से लेकर संतोष गंगवार तक कई दिग्गज नेताओं ने बढ़ाया शहर का राजनीतिक कद
बरेली। ऐतिहासिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से बरेली की अपनी विशिष्ट पहचान रही है। पांचाल क्षेत्र की प्राचीन विरासत से लेकर आधुनिक उत्तर प्रदेश की राजनीति तक बरेली ने देश और प्रदेश को अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक व्यक्तित्व दिए हैं। इसी राजनीतिक इतिहास में भारत रत्न एवं स्वतंत्रता सेनानी पंडित गोविंद बल्लभ पंत का नाम भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
महाभारत काल से बरेली का संबंध पांचाल क्षेत्र के रूप में जोड़ा जाता है। मान्यता है कि आंवला क्षेत्र प्राचीन पांचाल से जुड़ा रहा और द्रौपदी को पांचाली के नाम से भी जाना जाता है। आंवला क्षेत्र में आज भी लीलौर झील और प्राचीन किले के अवशेष इस ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाते हैं।
बरेली शहर से चुनाव जीतकर पहुंचे थे विधानसभा
उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में प्रसिद्ध पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने 1952 के विधानसभा चुनाव में बरेली शहर विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। उनके मुकाबले जनसंघ के प्रत्याशी मनमोहन लाल माथुर थे, जो जकाती मोहल्ले के निवासी तथा प्रसिद्ध अधिवक्ता और जिला बार एसोसिएशन से जुड़े रहे थे।
कड़े मुकाबले में पंत ने चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश का नेतृत्व किया। पंत संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री के रूप में 1937 से 1939 तक भी पद पर रहे और स्वतंत्रता के बाद पुनः मुख्यमंत्री बने।
उत्तर प्रदेश के बाद संभाली केंद्रीय गृह मंत्री की जिम्मेदारी
गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 10 सितंबर 1887 को खूंट गांव, अल्मोड़ा, वर्तमान उत्तराखंड में हुआ था। उनके पिता मनोरथ पंत और माता गोविंदी पंत थीं।स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पंत बाद में भारत सरकार में गृह मंत्री भी बने। उन्होंने 1955 से 1961 तक केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में कार्य किया। भारत सरकार ने उनके राष्ट्र के प्रति योगदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया।
7 मार्च 1961 को दिल्ली में उनका निधन हुआ। आज उनकी 139वीं जयंती पर बरेली से उनके राजनीतिक संबंध को एक बार फिर याद किया जा रहा है।
बरेली शहर की राजनीति में कांग्रेस से भाजपा तक का सफर
गोविंद बल्लभ पंत के बाद भी बरेली शहर विधानसभा क्षेत्र प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण बना रहा। लंबे समय तक इस सीट पर कांग्रेस का प्रभाव रहा। 1969 में बीकेडी के राम सिंह खन्ना ने यहां से जीत दर्ज की। बाद में उन्होंने कांग्रेस में वापसी की और 1980 में बरेली से जीतकर प्रदेश सरकार में नगर विकास मंत्री बने।इसके बाद बरेली शहर से भाजपा के डॉ. दिनेश जौहरी ने जीत दर्ज की और प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने। राजेश अग्रवाल ने भी बरेली शहर विधानसभा सीट से जीतकर प्रदेश सरकार में वित्त मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। बाद में बरेली कैंट सीट से विधायक रहते हुए वह विधानसभा अध्यक्ष भी बने और भाजपा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष का दायित्व भी संभाला।बरेली शहर से भाजपा के डॉ. अरुण कुमार भी लगातार तीन बार जीत दर्ज कर चुके हैं और प्रदेश सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं।
संतोष गंगवार ने बरेली को राष्ट्रीय राजनीति में दिलाई पहचान
बरेली लोकसभा सीट ने भी राष्ट्रीय राजनीति में कई बड़े नाम दिए। भाजपा के संतोष कुमार गंगवार ने बरेली लोकसभा क्षेत्र से आठ बार जीत दर्ज कर केंद्र सरकार में पेट्रोलियम, वस्त्र और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में वह झारखंड के राज्यपाल के रूप में दायित्व निभा रहे हैं।
सतीश चंद्र अग्रवाल से शुरू हुआ लोकसभा का सफर
बरेली लोकसभा क्षेत्र में पहला आम चुनाव 1952 में हुआ। कांग्रेस के टिकट पर सतीश चंद्र अग्रवाल निर्वाचित होकर लोकसभा पहुंचे। इसके बाद 1957, 1962 और 1971 के चुनावों में भी उन्होंने जीत दर्ज की। वह केंद्र में रक्षा राज्य मंत्री भी रहे।1962 में भारतीय जनसंघ के टिकट पर ब्रजराज सिंह सांसद चुने गए। 1977 में लोकदल के राममूर्ति ने जीत दर्ज की। आपातकाल के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर बरेली में वापसी की और 1980 तथा 1984 के लोकसभा चुनाव में बेगम आबिदा अहमद ने जीत दर्ज की।
इसके बाद बरेली लोकसभा सीट पर भाजपा का प्रभाव मजबूत होता गया। वर्ष 2009 में कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन ने भाजपा के प्रभुत्व को तोड़ते हुए जीत हासिल की। इसके बाद संतोष कुमार गंगवार ने फिर बरेली में अपना राजनीतिक प्रभाव कायम किया। वर्तमान में बरेली लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भाजपा के छत्रपाल गंगवार कर रहे हैं।
बरेली से जुड़े रहे मेनका और वरुण गांधी
बरेली जिले का राजनीतिक प्रभाव केवल बरेली लोकसभा तक सीमित नहीं रहा। पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने पीलीभीत के बाद आंवला लोकसभा क्षेत्र का भी भाजपा की ओर से प्रतिनिधित्व किया। वहीं संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी ने बहेड़ी विधानसभा क्षेत्र को शामिल करने वाले लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता भी बरेली की पहचान
राजनीतिक महत्व के साथ बरेली अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के लिए भी जाना जाता है। शहर को नाथ नगरी के नाम से भी पहचान मिली है। वहीं सुन्नी इस्लाम के बरेलवी मसलक और आला हजरत की विरासत ने बरेली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। शहर की सूफी परंपरा में खानकाह-ए-नियाजिया का महत्वपूर्ण स्थान है।
बरेली में हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक सौहार्द की मिसाल के रूप में चुन्ना मियां मंदिर का भी उल्लेख किया जाता है, जिसके निर्माण में मुस्लिम व्यवसायी फजल-उर-रहमान उर्फ चुन्ना मियां का योगदान बताया जाता है। आंवला क्षेत्र जैन परंपरा में भगवान पार्श्वनाथ से जुड़ी मान्यताओं के कारण भी विशेष महत्व रखता है।
प्रदेश की राजनीति में आज भी बरेली का दबदबा
आज बरेली की राजनीति में भाजपा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जिले से भाजपा के सांसद और कई विधायक प्रदेश तथा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। एमएलसी, महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष और संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर भी भाजपा के नेता जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इस तरह पांचाल की ऐतिहासिक धरती से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति तक बरेली की यात्रा बेहद महत्वपूर्ण रही है। गोविंद बल्लभ पंत का बरेली शहर सीट से चुनाव जीतना और उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश का नेतृत्व करना बरेली के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
