संतोष गंगवार का चाणक्य दांव! श्रुति गंगवार की राज्यसभा एंट्री से बरेली की सियासत में नए समीकरण

श्रुति गंगवार की राज्यसभा के लिए संभावित एंट्री ने बरेली की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया है। संतोष गंगवार की राजनीतिक विरासत और श्रुति के सामाजिक, कारोबारी व राजनीतिक सफर को 2027 के विधानसभा चुनाव के संभावित समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।

IIT से स्टार्टअप तक का सफर तय करने वाली श्रुति गंगवार अब राष्ट्रीय राजनीति में रखेंगी कदम, बरेली में बढ़ी राजनीतिक सक्रियता

बरेली। उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और आठ बार के पूर्व सांसद संतोष कुमार गंगवार का नाम लंबे समय से बरेली की सियासत के प्रमुख चेहरों में शुमार रहा है। अब उनकी पुत्री श्रुति गंगवार का राज्यसभा के लिए भाजपा प्रत्याशी के रूप में सामने आना बरेली मंडल की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म देता दिखाई दे रहा है।

राजनीतिक हलकों में इसे संतोष गंगवार की राजनीतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। श्रुति गंगवार का नाम राज्यसभा के लिए सामने आने के बाद बरेली की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

श्रृति गंगवार के साथ वरिष्ठ पत्रकार निर्भय सक्सेना।

आठवें प्रत्याशी के रूप में श्रुति का नाम और राजनीतिक संदेश

राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा की सूची में श्रुति गंगवार का नाम आठवें प्रत्याशी के रूप में सामने आया। इसके बाद राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें बरेली पर टिक गईं। माना जा रहा है कि भाजपा ने इस कदम के जरिए महिला नेतृत्व, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संगठन के पुराने प्रभावशाली चेहरों की राजनीतिक विरासत—तीनों को साधने की कोशिश की है।

सपा की ओर से तीसरे प्रत्याशी को लेकर भी चर्चाएं हुईं, लेकिन अंततः चुनाव की स्थिति नहीं बनने से सभी प्रत्याशियों के निर्विरोध निर्वाचन का रास्ता आसान हो गया।

लोकसभा टिकट न मिलने के बाद भी कायम रहा संतोष गंगवार का प्रभाव

पिछले लोकसभा चुनाव में संतोष कुमार गंगवार को भाजपा ने बरेली से टिकट नहीं दिया था। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में उनके भविष्य को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए गए। बरेली से छत्रपाल सिंह गंगवार भाजपा के सांसद निर्वाचित हुए और स्थानीय राजनीति में नए समीकरण दिखाई देने लगे।

इसके बावजूद संतोष गंगवार की राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। झारखंड के राज्यपाल के रूप में नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके राजनीतिक कद को लेकर एक बार फिर चर्चाएं तेज हुईं।

बरेली की राजनीति को करीब से देखने वाले लोगों का मानना है कि लंबे राजनीतिक अनुभव, संगठन में पकड़ और विभिन्न वर्गों के साथ संवाद ने संतोष गंगवार को क्षेत्र की राजनीति में अब भी महत्वपूर्ण बनाए रखा है।

श्रुति गंगवार की सक्रियता ने पहले ही बना दी थी जमीन

राज्यसभा की राजनीति में प्रवेश से पहले श्रुति गंगवार बरेली की स्थानीय राजनीति और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रही हैं। बहेड़ी, नवाबगंज और भोजीपुरा जैसे क्षेत्रों में उनकी सक्रियता को राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जाता रहा है

अर्बन कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, बरेली की चेयरपर्सन के रूप में भी उन्होंने अपनी भूमिका निभाई है। इसके अलावा भारत सेवा ट्रस्ट से जुड़ी सामाजिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी रही है। विशेष रूप से गरीबों के लिए नेत्र परीक्षण और मोतियाबिंद उपचार से जुड़े शिविरों का उल्लेख उनके समर्थक करते रहे हैं।

IIT रुड़की से पढ़ाई, Infosys से करियर की शुरुआत

श्रुति गंगवार का शैक्षणिक और पेशेवर सफर भी चर्चा में रहा है। 25 दिसंबर 1977 को बरेली के चौधरी तालाब क्षेत्र में संतोष गंगवार और सौभाग्य गंगवार के परिवार में जन्मीं श्रुति गंगवार ने IIT रुड़की से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने IIM बेंगलुरु में भी अध्ययन किया।

उन्होंने अपने पेशेवर करियर की शुरुआत Infosys से की और देश-विदेश के विभिन्न प्रोजेक्ट्स पर काम किया। वर्ष 2012 में बेंगलुरु से एडटेक क्षेत्र में स्टार्टअप शुरू किया और 2016 में नोएडा में आईटी सर्विस के क्षेत्र में कंपनी स्थापित की।

राजनीति में आने से पहले कॉरपोरेट और उद्यमिता के क्षेत्र में उनका अनुभव अब उनकी राजनीतिक यात्रा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या 2027 विधानसभा चुनाव पर भी पड़ेगा असर?

श्रुति गंगवार की राज्यसभा में संभावित एंट्री का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव बरेली मंडल में देखने को मिल सकता है। बरेली और आसपास के जिलों में कुर्मी समाज की महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका को देखते हुए उनकी नई जिम्मेदारी को सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

हालांकि 2027 के विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका क्या होगी, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन राज्यसभा के रास्ते राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश के बाद उनके राजनीतिक कद में निश्चित रूप से इजाफा होगा।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि भविष्य में भाजपा संगठन या सरकार में उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

बरेली में राजनीतिक विरासत की लंबी परंपरा

बरेली की राजनीति में राजनीतिक परिवारों की भूमिका कोई नई बात नहीं है। अलग-अलग दलों में कई ऐसे उदाहरण रहे हैं, जहां एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी ने राजनीति में अपनी जगह बनाई।

कांग्रेस और भाजपा समेत विभिन्न दलों में ऐसे परिवार रहे हैं जिनकी अगली पीढ़ी ने राजनीति में प्रवेश किया। यही वजह है कि श्रुति गंगवार की संभावित राज्यसभा एंट्री को भी बरेली की राजनीतिक विरासत और नई पीढ़ी के नेतृत्व के संदर्भ में देखा जा रहा है।

हालांकि राजनीतिक विरासत अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं होती। संगठन में स्वीकार्यता, जनता के बीच सक्रियता, राजनीतिक परिस्थितियां और चुनावी समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

‘लेगेसी ट्रांसफर’ की राजनीति पर भी बहस

पूर्व सांसद राजवीर सिंह के पुत्र धीरेंद्र सिंह द्वारा साझा किए गए एक पुराने प्रसंग में राजनीतिक विरासत को समय रहते अगली पीढ़ी को सौंपने की जरूरत पर चर्चा की गई है। उनका कहना है कि यदि कोई वरिष्ठ नेता अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना चाहता है तो अपने जीवनकाल में ही उसे मजबूत आधार देना बेहतर रहता है।

यही विचार अब श्रुति गंगवार के राज्यसभा प्रवेश के संदर्भ में भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है

अब बरेली की राजनीति पर सबकी नजर

युक्ति नहीं, बल्कि बरेली मंडल की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत भी मानी जा रही है। संतोष गंगवार की लंबी राजनीतिक पारी के बाद उनकी बेटी का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश यह बताता है कि बरेली की राजनीति में गंगवार परिवार की भूमिका अभी समाप्त नहीं हुई है।

बरेली में परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने की बात हो तो उसमें गिने चुने नाम ही सामने आते हैं । बरेली केंट विधान सभा से कांग्रेस के अशफाक अहमद, उनके बेटे इस्लाम साबिर,उनके बेटे शहजिल इस्लाम, अशफाक के भाई रफीक अहमद रफ़न, प्रदेश सरकार में कांग्रेस के पूर्व मंत्री धर्म दत्त वैद्य एवं उनके बेटे भूपेंद्र नाथ शर्मा, पूर्व मंत्री रहे कांग्रेस के ओम प्रकाश सिंह की पुत्री सुमन लता सिंह ( बीजेपी), कांग्रेस के पूर्व सांसद/ विधायक प्रवीण सिंह की पत्नी सुप्रिया एरन, पूर्व विधायक व मेयर स्वर्गीय सुभाष पटेल की पुत्र वधु रश्मि पटेल जिला पंचायत अध्यक्ष, केसर सिंह की परिवार की रश्मि गंगवार, जिला पंचायत अध्यक्ष, पूर्व विधायक स्वर्गीय बीरेन्द्र सिंह परिवार की जिला पंचायत अध्यक्ष  आदि के ही नाम हैं ।             

आजकल पूर्व सांसद व विधायक सर्वराज सिंह के पुत्र सिद्ध राज सिंह, बीजेपी में पूर्व मंत्री रहे स्वर्गीय डॉ दिनेश जौहरी के पुत्र राहुल जौहरी, बीजेपी के सांसद रहे कद्दावर नेता ठाकुर राजबीर सिंह के पुत्र धीरेंद्र राजवीर सिंह, विधायक स्वर्गीय केसर सिंह के पुत्र, स्वर्गीय कुंवर सुभाष पटेल पूर्व विधायक व मेयर के पुत्र प्रशांत पटेल, उमेश गौतम मेयर के पुत्र पार्थ गौतम, प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री रहे भानु प्रताप सिंह की पुत्री तेजेश्वरी सिंह, कांग्रेस सरकार में पूर्व मंत्री चेतराम गंगवार के पौत्र भुजेंद, पूर्व सांसद कल्याण सिंह की पुत्री लता सिंह भी बीजेपी टिकट की मिलने की मन में इच्छा रखकर अपने अपने राजनीतिक आकाओ के दरबार में 2027 के विधान सभा चुनाव टिकट के लिये हाजिरी लगा रहे हैं। पर मेहनत के साथ भाग्य भी  मायने रखता है ।  

अब देखना यह होगा कि राज्यसभा के बाद श्रुति गंगवार किस तरह अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाती हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव के दौरान बरेली मंडल की राजनीति में उनकी भूमिका कितनी प्रभावशाली रहती है।