जब आपातकाल का ज़िक्र होता है, तो संजय गांधी और उनकी पांच सूत्रीय योजनाएं बरबस याद आती हैं। इन्हीं में सबसे विवादित योजना थी – परिवार नियोजन, जिसमें जबरन नसबंदी की कहानियाँ इतिहास के काले पन्नों में दर्ज हो चुकी हैं।
और इस पूरे अभियान में एक नाम ऐसा था जिसने अपनी मौजूदगी से एक पूरे समुदाय को सिहरने पर मजबूर कर दिया – रुखसाना सुल्ताना।
सुंदरता, शक्ति और खौफ का मेल
रुखसाना को देखकर लोग ‘हसीन’ जरूर कहते थे, लेकिन जामा मस्जिद के आसपास जब उनकी कार आती थी तो लोग डर से दरवाज़े बंद कर लेते थे। कहा जाता है, “उन्हें देखते ही मर्दों की रूह कांप जाती थी।”
रुखसाना का राजनीति या सामाजिक कामों से कोई लेना-देना नहीं था। वो एक फैशन बुटीक चलाती थीं और दिल्ली की समाजिक पार्टियों में शामिल होती थीं। लेकिन जब संजय गांधी की नजर उन पर पड़ी, तो वे एक “प्रोजेक्ट” बन गईं।
संजय गांधी की ‘ख़ास महिला’
रुखसाना ने खुद संजय गांधी से पूछा था – “मैं आपके लिए क्या कर सकती हूं?”
जवाब था – “मुस्लिम इलाकों में जाकर नसबंदी कराओ।”
बस, यहीं से एक ‘सिविल मिशन’ की शुरुआत हुई जिसने समाज को हिला कर रख दिया।
रुखसाना को दिल्ली के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों, खासकर पुरानी दिल्ली, जामा मस्जिद क्षेत्र में भेजा गया। उन्होंने यहां छह नसबंदी कैंप शुरू किए। घर-घर जाकर लोगों को समझाना शुरू किया, लेकिन जल्द ही ये मुहिम जबरदस्ती और आतंक का रूप लेने लगी।
विनोद मेहता की मुलाकात – पर्दे के पीछे का सच
पत्रकार विनोद मेहता ने अपनी किताब The Sanjay Story में उस समय का एक वाकया दर्ज किया है, जो रुखसाना की छवि और उनके तरीकों को बेनकाब करता है।
मेहता ने लिखा:
“मैं जब रुखसाना से मिला, तो वो मुझे नसबंदी की मानवीय तस्वीर दिखाना चाहती थीं। उन्होंने कहा – ‘आइए, चलिए मिलवाती हूं उन लोगों से जो कैंप चला रहे हैं।’ मैं उनकी कार में बैठ गया।”
जब कार एक संकरी गली में एक पुराने से मकान के सामने रुकी और मेहता अंदर पहुंचे, तो सामने जो लोग थे, उन्हें देखकर वो चौंक गए।
“वे लोग बेहद डरावनी शक्लों वाले थे। मैंने पूछा – ये कौन हैं?
रुखसाना मुस्कुराईं और बोलीं – ‘ये राजस्थानी नायक हैं। देख रहे हैं इसको? ये इनका मुखिया है। इसने आठ मर्डर किए हैं और एक भी लाश नहीं मिली।’
फिर वो उस आदमी से हँसकर बोलीं – ‘तो कितने आदमी मारे हैं तुमने? आठ या इससे ज्यादा?’“
यही थे वो लोग जो रुखसाना के ‘स्वैच्छिक’ नसबंदी कैंप चला रहे थे।

दो इमामों का ‘सरकारी’ नसबंदी कराना
जब मेरठ, मुज़फ़्फरनगर, सुल्तानपुर जैसे इलाकों में नसबंदी विरोधी दंगे फूटने लगे, तो रुखसाना ने एक मास्टरस्ट्रोक चला – मुज़फ्फरनगर के दो मुस्लिम इमामों को नसबंदी के लिए तैयार कर लिया।
शरीफ अहमद और नूर मोहम्मद नाम के इन इमामों को नसबंदी प्रमाणपत्र के साथ 101 रुपये का नकद ईनाम संजय गांधी ने दिया। अगले दिन की अख़बारों में उनकी तस्वीरें छपीं।
इस एक घटना ने सरकार को ‘मुस्लिम विरोधी नसबंदी अभियान’ के आरोपों से एक तरह की ढाल दे दी, भले ही जमीनी सच्चाई कुछ और ही थी।
और फिर रुखसाना गुमनाम हो गईं…
आपातकाल खत्म हुआ। जनता पार्टी की सरकार आई। संजय गांधी का सितारा डूब गया और रुखसाना पर्दे के पीछे चली गईं।
कई साल बाद उनका नाम फिर सामने आया – जब उनकी बेटी अमृता सिंह की फिल्म बेताब (1983) रिलीज़ हुई।
उपसंहार
रुखसाना सुल्ताना की कहानी सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है। यह उस दौर की तस्वीर है जब सत्ता और भय ने मिलकर लोकतंत्र की रेखाओं को मिटा देने की कोशिश की थी।






