वरिष्ठ पत्रकार निर्भय सक्सेना की आंखों-देखी यादें—सेंसरशिप, गिरफ्तारियां, प्रेस पर पहरा और लोकतंत्र की वापसी की कहानी
जब अखबारों पर लग गई सेंसरशिप की मुहर
बरेली। उस समय वर्ष 1975 मैं दैनिक विश्व मानव के संपादकीय विभाग में था। देश में 25 जून 1975 की मध्य रात्रि में इमरजेंसी की घोषणा होते ही दिल्ली के पंजाब केसरी, इंडियन एक्सप्रेस सहित कई दैनिक समाचार पत्रों ने संपादकीय वाला स्थान खाली छोड़कर अपना विरोध जताया था। जिस पर कुछ संपादकों की गिरफ्तारी भी हुई थी। देश में इमरजेंसी को लोकतंत्र पर काला धब्बा कहा गया था।
बरेली में पटेल चौक स्थित चाय घाट फाइव स्टार पर कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल बाजपेई की कविता
“बरुआ भैया कुछ तो जुगत बतावो जा राज नारायण को मीसा में अंदर करवावो”
खूब चर्चित हुई। कुछ राजनैतिक लोग अपनी गिरफ्तारी से भूमिगत हो गये थे l कुछ डरे हुए भी थे।
अब यह बात अलग है कि देश में इमरजेंसी हटने के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने उस काल में बंदी लोगो को लोकतंत्र सेनानी घोषित कर उनकी पेंशन भी बांध दी थी। मुलायम सिंह यादव के उपकार से उत्तर प्रदेश में अधिकांश भाजपाई लोकतंत्र सेनानी वाली सरकारी पेंशन ले रहे हैं।
बरेली में उस समय दैनिक विश्व मानव का प्रबंधन स्वर्गीय लक्ष्मण दयाल सिंघल के हाथ मे था जो कांग्रेस के पक्षधर भी थे। मुझे याद है कि दैनिक विश्व मानव के समाचार संपादक जितेंद्र भारद्वाज एवं राम गोपाल शर्मा ने संपादकीय के सभी लोगो से देश में लगी इमरजेंसी वाले काल में सरकार के विरोध में कुछ नही लिखने के निर्देश दिए थे।
संपादकीय टीम को स्वर्गीय ज्ञानसागर वर्मा, कन्हैया लाल बाजपेई देखते थे। सिटी न्यूज़ को स्वतंत्र सक्सेना, राकेश कोहरवाल, निर्भय सक्सेना, कमल शर्मा, सतीश कमल आदि देखते थे। रात में इंटेलिजेंस के अधिकारी हर खबर पर पास या रद्द होने की मोहर लगाते थे। तत्कालीन जिला सूचना अधिकारी वसंत वर्मा भी रात में शहर की न्यूज़ पर नजर रखते थे कि कही कोई गलत खबर नहीं छप जाए।
एक दिन बाद जनसंघ के नेता सत्य प्रकाश अग्रवाल जेल भेजे गए। रिपोर्टर ने देर रात यह खबर ज्ञान सागर वर्मा से घसीटा राइटिंग में लिखवाई। मेने इंटेलिजेंस टीम को अन्य न्यूज़ के बंच के साथ भेज दी और अपठनीय होने पर वह गिरफ्तारी की न्यूज़ पर पास होने की मोहर झटके में लग कर वापस आ गई। जब सुबह सत्य प्रकाश अग्रवाल की न्यूज़ दैनिक विश्व मानव पेपर में छपी तो बरेली सहित राजधानी लखनऊ तक हड़कंप मच गया।
संपादक जी ने न्यूज़ पास होने की मोहर लगी कॉपी जिला सूचना अधिकारी को दिखा दी। जिस पर उस इंटेलिजेंस अधिकारी को हटाकर दूसरा व्यक्ति भेज गया। बरेली में उस समय जॉर्ज फर्नाडीस के साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ नामक समाचार पत्र के प्रतिनिधि वीरेन डंगवाल थे, जो रात में डरे हुए घबराहट में देर रात आकर दैनिक विश्व मानव की प्रिंटिंग मशीन के नीचे सोते थे।
आपातकाल में मैने सुभाषनगर गुरुद्वारा में सरदार स्वर्गीय उपकार सिंह के साथ जाकर वहां रह रहे लोगो से भी बात की थी। कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल बाजपेयी की इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के दिए गए निर्णय के बाद लिखी कविता उन दिनों चाय घाट ‘फाइव स्टार’ पर बहुत सुनी जाती थी। वह थी … ‘बरुआ भैया कुछ तो जुगत बताओ, जा राजनारायण को जल्दी ही मीसा में जेल भिजवावो’।
जब कुंवर सर्वराज सिंह ने राजनारायण की प्रेस वार्ता कराई।
स्मरण रहे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जग मोहन लाल सिन्हा ने राजनारायण बनाम श्रीमती इन्दिरा गाँधी केस की सुनवाई करने के बाद 12 जून 1975 के अपने ऐतिहासिक फैसले में रायबरेली संसदीय क्षेत्र से श्रीमती इन्दिरा गाँधी का निर्वाचन भ्रष्ट साधनों के उपयोग के कारण रद्द कर दिया था। जून माह में जब होटल उबेराय आनंद में सांसद रहे कुंवर सर्वराज सिंह ने राजनारायण की पत्रकार वार्ता कराई थी । जिस पर राजनारायण ने कहा था सच की ही जीत होगी। राजनारायण जी ने होटल से नीचे आकर झोली में भुने चने बेच रहे चने वाले से चार आने के चने खरीद कर मुझे एवम अन्य पत्रकारों को खिलाए भी थे। कहा था नेताओ का वास्तव में यही चना चबेना होता है।
जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के फैसले ने पलट दी बाजी
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के द्वारा राजनरायण सिंह के पक्ष में दिए इस अभूतपूर्व फैसले से भारत की राजनीति में भूचाल आ गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी को अदालत के इस निर्णय से काफी गहरा धक्का लगा था और इसी निर्णय से प्रधानमंत्री के सलाहकारों ने देश में इमरजेंसी लगाने की भूमिका बना दी और आखिर 25 जून को 1975 को देश पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी थोप कर देश के प्रमुख विपक्षी राजनेताओं को जेल में डाल दिया गया था।
जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा: वह फैसला जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी
बरेली से जुड़ा रहा ऐतिहासिक न्यायाधीश का सफर
इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह साहसिक फैसला सुनाने वाले जस्टिस स्वर्गीय जगमोहन लाल सिन्हा का बरेली के गुलाबनगर से भी गहरा नाता रहा था। उन्होंने बरेली कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 1943 से 1955 तक बरेली में अधिवक्ता के रूप में कार्य किया। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपने ऐतिहासिक और निष्पक्ष फैसले के लिए हमेशा याद किए जाते रहेंगे।
इंदिरा गांधी के इस्तीफे की उठी मांग
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद विपक्ष हमलावर हो गया और देशभर में धरना, प्रदर्शन तथा रैलियों का दौर शुरू हो गया।
जेपी आंदोलन से हिलने लगी सत्ता
श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ चल रहे आंदोलन की अगुवाई लोकनायक जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। आंदोलन को मिल रहे व्यापक जनसमर्थन ने दिल्ली की सत्ता को चिंता में डाल दिया। विपक्ष लगातार प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा था।
रामलीला मैदान की ऐतिहासिक रैली
25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की विशाल रैली आयोजित हुई। इसमें भारी जनसमूह उमड़ा। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपने भाषण से जनता में नई ऊर्जा का संचार किया और सरकार के खिलाफ आंदोलन को और तेज कर दिया।
25 जून 1975: देश पर लगा आपातकाल
विपक्ष के बढ़ते दबाव के बीच श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी। आलोचकों का आरोप रहा कि संवैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर यह निर्णय लिया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए और 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को आपातकाल लागू हो गया।
लोकतंत्र पर लगा सबसे बड़ा प्रतिबंध
आपातकाल के दौरान पूरे देश में भय और दहशत का माहौल बन गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई। विपक्षी नेताओं, समाजसेवियों, छात्र नेताओं और पत्रकारों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। लोगों को बिना मुकदमे जेलों में बंद किया गया।
जेलों में बंद हुए बड़े-बड़े नेता
लोकनायक जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, मुरली मनोहर जोशी, जॉर्ज फर्नांडिस, चौधरी चरण सिंह और राजनारायण जैसे प्रमुख नेताओं को जेल भेज दिया गया। देश की राजनीतिक गतिविधियां लगभग ठहर सी गईं।
प्रेस पर लगी सेंसरशिप
आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर भी कड़ा नियंत्रण लगाया गया। समाचार पत्रों की सामग्री प्रकाशन से पहले सरकारी अधिकारियों द्वारा जांची जाती थी। आलोचनात्मक सामग्री प्रकाशित करने पर कार्रवाई की जाती थी। कई पत्रकारों को जेल भेजा गया और कई अखबारों को दबाव का सामना करना पड़ा।
19 महीने बाद हुए चुनाव
करीब 19 महीने तक चले आपातकाल के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को आम चुनाव कराने की घोषणा की। इसके बाद विपक्षी दलों ने एकजुट होकर जनता पार्टी का गठन किया और चुनाव मैदान में उतरे।
जनता पार्टी की जीत और लोकतंत्र की वापसी
1977 के चुनाव में जनता पार्टी को ऐतिहासिक सफलता मिली और कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा। 22 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी और देश में लोकतंत्र की पुनः बहाली हुई।
बरेली आईं इंदिरा गांधी
चुनाव हारने के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने देशभर में दौरे शुरू किए। इसी क्रम में वह बरेली भी आई थीं। उस दौरान त्रिशूल एयरपोर्ट पर उनकी पत्रकारों से बातचीत हुई और बाद में उन्होंने नानकमत्ता का दौरा भी किया।
आपातकाल की यादें आज भी जिंदा हैं
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादित अध्याय माना जाता है। यह दौर लोकतांत्रिक अधिकारों, प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक स्वतंत्रताओं पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण आज भी चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है।
आज का भारत और लोकतंत्र की यात्रा
आपातकाल के 50 वर्ष बाद भारत एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था के रूप में खड़ा है। समय के साथ देश की राजनीति, शासन व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं ने अनेक बदलाव देखे हैं, लेकिन 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में हमेशा एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में याद किया जाएगा।

